भारत के हिन्दी सिनेमा में इसकी स्थापना के बाद ही एक औद्योगिक संस्था बनने की पूरी संभावनाएं थी जो कुछ ही समय में दिखने लगी। सामाजिक और राजनीतिक सरोकार वाली फिल्मों को बनाते हुए यह धीरे धीरे एक व्यवसायिक उत्पाद में बदल कर रह गया। यहाँ बनने वाली राजनीतिक रूप से सशक्त फिल्मों को 1990 के बाद आये उदारवाद ने किस तरह बदला और इसके चलते हिन्दी फिल्म जगत में किस तरह से कथ्य और अन्य परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं, इस शोध के द्वारा इसी को जानने की कोशिश की गई है। इस शोध पत्र के माध्यम से हिन्दी सिनेमा में उदारवाद और उसके प्रभावों का एक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। इसके माध्यम से यह जानने की कोशिश की गयी है कि हिन्दी सिनेमा में बनने वाली राजनीतिक फिल्मों में किस तरह की गिरावट आई है और आज उसके सामने किस तरह की चुनौतियाँ है। आज राजनीतिक विषय वाली फिल्मों को लोग प्रोपैगंडा कहकर ख़ारिज कर रहे हैं। तो अब किस तरह से इन विषयों को लोगों के सामने रखा जाये, यह शोध पत्र उसकी भी एक पड़ताल करता है।
कीवर्ड: हिन्दी फिल्म, उदारवाद, आर्थिक नीति, राजनीतिक सिनेमा
गौरव शुक्ल, शोध छात्र, डिपार्टमेंट ऑफ जर्नलिज़्म एण्ड मास कम्युनिकेशन, स्कूल ऑफ मीडिया स्टडीज एण्ड ह्यूमैनिटीज, मानव रचना इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ रिसर्च एण्ड स्टडीज
डॉ राहुल जोशी, असिस्टेंट प्रोफेसर, डिपार्टमेंट ऑफ जर्नलिज़्म एण्ड मास कम्युनिकेशन, स्कूल ऑफ मीडिया स्टडीज एण्ड ह्यूमैनिटीज, मानव रचना इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ रिसर्च एण्ड स्टडीज

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